बुधवार, 29 दिसंबर 2010

रहि - रहि आवे अंगड़ाई

रहि - रहि आवे अंगड़ाई ,

बुझाला परदेशी आजु आई ।

रहि - रहि खपड़ा पे काग बोलि जाला

रहि - रहि पुरुवा किवाड़ खोलि जाला

हमरा के डँसे तनहाई ,

बुझाला परदेशी आजु आई ।

हथवा से भरल गिलास छूटि जाला

सुतला में रतिया के नींद टूटि जाला

रहि - रहि आवेले जम्हाई ,

बुझाला परदेशी आजु आई ।

रहि - रहि हाथ बायाँ गोड़ खजुआला

चरचा करत आवें हमके बुझाला

अँखिया से आवेले रोवाई ,

बुझाला परदेशी आजु आई ।

मोर देवरनियां मारेले रोज ताना

कसके करेजवा विरह सुनि गाना

केकरा से चिठिया पठाई ,

बुझाला परदेशी आजु आई ।

हमरा से कहने सवनवां में आइब

मेंहदी रचाई के सगुनवां मनाइब

नाहीं अइले 'कंचन' कसाई,

बुझाला परदेशी आजु आई

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