बुझाला परदेशी आजु आई ।
रहि - रहि खपड़ा पे काग बोलि जाला
रहि - रहि पुरुवा किवाड़ खोलि जाला
हमरा के डँसे तनहाई ,
बुझाला परदेशी आजु आई ।
हथवा से भरल गिलास छूटि जाला
सुतला में रतिया के नींद टूटि जाला
रहि - रहि आवेले जम्हाई ,
बुझाला परदेशी आजु आई ।
रहि - रहि हाथ बायाँ गोड़ खजुआला
चरचा करत आवें हमके बुझाला
अँखिया से आवेले रोवाई ,
बुझाला परदेशी आजु आई ।
मोर देवरनियां मारेले रोज ताना
कसके करेजवा विरह सुनि गाना
केकरा से चिठिया पठाई ,
बुझाला परदेशी आजु आई ।
हमरा से कहने सवनवां में आइब
मेंहदी रचाई के सगुनवां मनाइब
नाहीं अइले 'कंचन' कसाई,
बुझाला परदेशी आजु आई ।