बुधवार, 29 दिसंबर 2010

रहि - रहि आवे अंगड़ाई

रहि - रहि आवे अंगड़ाई ,

बुझाला परदेशी आजु आई ।

रहि - रहि खपड़ा पे काग बोलि जाला

रहि - रहि पुरुवा किवाड़ खोलि जाला

हमरा के डँसे तनहाई ,

बुझाला परदेशी आजु आई ।

हथवा से भरल गिलास छूटि जाला

सुतला में रतिया के नींद टूटि जाला

रहि - रहि आवेले जम्हाई ,

बुझाला परदेशी आजु आई ।

रहि - रहि हाथ बायाँ गोड़ खजुआला

चरचा करत आवें हमके बुझाला

अँखिया से आवेले रोवाई ,

बुझाला परदेशी आजु आई ।

मोर देवरनियां मारेले रोज ताना

कसके करेजवा विरह सुनि गाना

केकरा से चिठिया पठाई ,

बुझाला परदेशी आजु आई ।

हमरा से कहने सवनवां में आइब

मेंहदी रचाई के सगुनवां मनाइब

नाहीं अइले 'कंचन' कसाई,

बुझाला परदेशी आजु आई

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

शोर हो गइल

उनके देखलीं त मनवा चकोर हो गइल

बात उनसे न कइलीं कि शोर हो गइल

चांन बदरी में कतहीं लुकाइल रहे

उनकी हंसला से सगरी अंजोर हो गइल

बात बात में कोहाइल आ रूसल करे

एतना नाजुक सनेहिया के डोर हो गइल

मन में सूरत के खाली बसा लिहली त

लोग लागल कहे मन क चोर हो गइल

जान लेके बुझाता कि आँसू रुकी

एतना कंचन के दिल में मरोर हो गइल ।

रात सपना में हमके बुला लिहलू

रात सपना में हमके बुला लिहलू - २

जब कि जिनगी में सचहूँ भुला दिहलू

रूप आ गुन क दुनिया पुजारी हवे

प्यार पैसा बदे सब भिखारी हवे

भीख मंगली त हमके झुला दिहलू

रात सपना में हमके बुला लिहलू ।

मन में कइ कइ तरह क विकार घेरलस

लाज संकोच खुद के विचार घेरलस

प्यार मिसिरी नियर तू घुला दिहलू

रात सपना में हमके बुला लिहलू ।

दर्द सपना कुरेदलस हरा हो गइल

तप के कंचन अगिन में खरा हो गइल

गीत गावत सुनावत रुला दिहलू

रात सपना में हमके बुला लिहलू ।